Sunday, May 23, 2010

मैं हूँ तुच्छ नहीं कोई महा कवी दिनकर जैसा
क्या होता काव्य ज्ञान कुछ नहीं जनता हूँ ऐसा
मनुज ही मानवता को शर्मसार कर देते हैं
बहन की इज्जत को ही तार तार कर देते हैं ।
पुत्र जब स्वयं मात्र भू का ही खंडन चाहतें हैं
औरअपने ही घर में स्वयं सेंध लगवाते हैं ।
पिलाया लहू बना कर दूध जब उसे लजाते हैं
और रूपपियों से जब इमान बेच कर खाते हैं
आत्म ग्लानी से पीड़ित हो कर जब ये रूह तड़पने लगती है
अब सस्त्र उठाना जुर्म हुआ तब कलम उठानी पड़ती है॥

हाँ मेरी इन बातो को मेरा पागलपन कह सकते हो
पर मुझसे नहीं सहा जाता तो तुम कैसे सह सकते हो
क्या पुत्र नहीं भारत माँ के , जो लुटता हुआ चीर देखो
जो ऐसा करने की सोचे भी तो उसे चीर ही दो
जो पाक साफ कहते खुद को नापाक इरादों वाले हैं
इनके चेहरे तो गोरे हैं पर अंतर मन तो काले हैं
सुन लो सीमा पर सभी जो अब आतंकी आयंगे
ना राख उन्हें होने देंगे ना खाक ही वो हो पाएंगे
बोर्डर की कटीली तारो पर उनके शव टाँगे जायेंगे
जब उन्हें पखेरू खायेंगे , अब तब हम कलम उठायेंगे

राजनीती के जाल देख कर है अंतर मन में बेचैनी
भारत पर लगती शत्रु की नजरें हैं पैनी पैनी
भोग विलास में लिप्त हुए हम चिर निद्रा मैं डूबे हैं
तुम्हे पता हैं शत्रु के कैसे कैसे मंसूबे हैं
रातों को हमला करतें दिन में जाल बिछातें हैं
आस्तीन मैं खंजर लेकर , अमन का हात बढ़ाते हैं
आज समय विपदाओं का हैं , भारत माता भाल उठा लो
मेरा मन बलिदानी है माँ मुझको अपनी ढाल बना लो
मैं चाहता हूँ सब्द सक्ति से मैं हवाओं की दिशा बदल दूं
अपने जूते की एड़ी से अरी सेना का शीस कुचल दूं
मेरे अंतर मैं ज्वाला है अग्नि हैं अंगारे हैं
राष्ट्र शत्रु तो बोस भगत ने पहले भी संघारे हैं
पूरा देश यही चाहता है कोई भगत सिंह पैदा हो
मगर पडोसी के घर मैं बस मेरे घर न ऐसा हो
जब तक ऐसे तुच्छ विचार हम सब के मन में पनपेंगे
तो मुझे बताओ वीर बघत सिंह किसके घर मैं जन्मेंगे
भगत सिंह के सब्द यही थे मुझे मार सकती है फांसी
मगर फिरंगी मम विचार को कभी मार ना पाएंगे
जगो राष्ट्र की युवा शक्ति , वह विचार करो आत्म सात
एक नहीं फिर कोटि कोटि भगत सिंह हो जायेंगे ॥

लेखक : आदित्य कुमार