Thursday, August 19, 2010

प्रेम है नहीं जाल कोई ये तो कच्ची डोर है ,
जिसका मैं एक छोर हूँ , उसका तू एक छोर है ,
प्रेम है स्वयमेव पूजा अर्चना आराधना है
वासना से मुक्त है जो प्रेम तो वह साधना है
स्वयं सदृश ईश के प्रेम निर आकर है ,
मात्र एक अनुभूति है फिर भी ये साकार है ,
नभ से ऊंचा गहरा सागर सम ,
ही होता है प्यार इसी लिए यह माना जाता ,
सृष्ठी का आधार ।

यह कविता मेरी 'सप्त स्वप्न ' का एक अंश है जो मुझे बहुत प्रिय है .....

आदित्य कुमार

3 comments:

vineet mishra.. said...

प्रेम है नहीं जाल कोई ये तो कच्ची डोर है ,
जिसका मैं एक छोर हूँ , उसका तू एक छोर है ,..

really nice..but thoda space aur lines ka khyal rakhen to kavita aur sunder najar aayegi..bhav to sunder hain hin..ur blog is also looking nice..

हरकीरत ' हीर' said...

प्रेम है नहीं जाल कोई ये तो कच्ची डोर है ,
जिसका मैं एक छोर हूँ , उसका तू एक छोर है ,
प्रेम है स्वयमेव पूजा अर्चना आराधना है
वासना से मुक्त है जो प्रेम तो वह साधना है
स्वयं सदृश ईश के प्रेम निर आकर है ,
मात्र एक अनुभूति है फिर भी ये साकार है ,
नभ से ऊंचा गहरा सागर सम ,
ही होता है प्यार इसी लिए यह माना जाता ,
सृष्ठी का आधार ।

आदित्य जी बहुत अच्छी रचना ....वाह ....!!

aditya kumar said...

vineet misra or harkeerat'heer' jika main hardik aabhar vyakt karta hun or abhinandan karta hun ki aap dono ne kavya ka mulyankan kia aur prashansa ki
bhavisya main bhi aap k sneh ki aasha karta hun..
isi tharah se mera marg darshan karte rahe

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